हमारी अपनी जिन्दगी भगवान की सबसे बड़ी देन है जिसके आगे दुनिया के सारे रूप-रंग और भोग-विलास कुछ भी नहीं हैं।
दुनिया भर के संसाधन भले हमारे पास कितने ही हों, कितना ही वैभव पसरा हुआ क्यों न हो, यदि हम ही न रहें, तो ये सारे किस काम के।
इंसान उन वस्तुओं और तत्वों की ओर भागता है जो उसकी नहीं हैं, उन्हें बनाने की कोशिश करता रहता है लेकिन भगवान के दिए हुए शरीर की उपेक्षा करता है।
उसका यह स्वभाव केवल शरीर के प्रति ही नहीं है बल्कि उन सभी के प्रति है जो उसे बिना मेहनत के मिल जाया करते हैं चाहे वह कोई व्यक्ति हों या फिर संसाधन, जमीन-जायदाद हो या पद-प्रतिष्ठा।
कुछ ही लोग होते हैं जो अपने जीवन और उसके लक्ष्य को समझते हैं और उसका आदर करते हुए जीवन में आगे बढ़ते रहते हैं अन्यथा बहुत से लोग हैं जो सहजता से प्राप्त हर वस्तु और व्यक्ति की उपेक्षा करते हैं लेकिन इनके अलावा के प्रति आकर्षण के सहारे बढ़ते रहते हैं।
आजकल कमोबेश सर्वत्र यही स्थिति है। भगवान का दिया हुआ यह शरीर दैवीय और दिव्य तत्वों से भरपूर रहना चाहिए और इसके लिए जिन्दगी भर प्रयत्न भी करते रहना चाहिए।
लेकिन लोग शरीर की हमेशा उपेक्षा करते रहते हैं और तब तक करते रहते हैं कि जब तक शरीर काम करना बंद न कर दे। शरीर को उन्हीं तत्वों से भरपूर रखने का प्रयत्न करते रहना चाहिए जो कि उनके लिए जरूरी हैं, गुणदायी और पौष्टिक हैं।
ऎसा होने पर शरीर हमेशा अपना साथ देता है और शरीर को लम्बे समय तक चलाने की गारंटी भी देता है लेकिन हम शरीर का अनादर करते रहने के आदी होते जा रहे हैं और उसे उन वस्तुओं से भरते जा रहे हैं जिनका कोई उपयोग नहीं है।
आजकल हमारी दैनिक जीवनचर्या का हाल इतना अधिक बिगड़ा हुआ है कि कुछ कहा नहीं जा सकता। शरीर को जो कुछ जरूरी है वह उसे निरन्तर प्राप्त होते रहना चाहिए। इसके खान-पान से लेकर जीवन व्यवहार और व्यायाम, धर्म-अध्यात्म का चिन्तन और मानसिक खुराक आदि सब कुछ समाहित हैं जिन्हें शरीर के लिए आवश्यक माना गया है।
शुद्ध-सात्विक और पोषणदायी खान-पान से लेकर हर तरह की चर्या को अपनाने की आवश्यकता है। जिस शरीर को विधाता ने बनाया है वह अपने आप में परफेक्ट संरचना है जिसे यदि हम संभाल कर रखते हुए जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहें तो लम्बे समय तक जी सकते हैं और संसार का आनंद प्राप्त कर सकते हैं।
लेकिन हम लोग शरीर की उपेक्षा करते हैं। नख से लेकर शिख तक हम सभी लोग सौन्दर्य तो भरपूर चाहते हैं लेकिन सौन्दर्य के जनक अंग-उपांगों के प्रति लापरवाही बरतते हैं। तने और पत्तों को हम खूब सींचते हैं लेकिन जड़ों की ओर कोई ध्यान नहीं दे पा रहे हैं।
ये जड़ें शारीरिक सौष्ठव की हो सकती हैं, संस्कारों, सभ्यता एवं परंपराओं की हो सकती हैं और उन सभी कारकों की हो सकती हैं जिनके बूते हमारे पुरखों ने दुनिया को इतना कुछ दिया है कि हम भुला नहीं पाते। और दूसरी तरफ हम क्या दे पा रहे हैं।
भोग-विलास के उपकरणों से बीमारियों का महा भण्डार। जिससे कि नई पीढ़ी या तो मरियल हो रही है या फिर जरूरत से कहीं अधिक मोटापे से ग्रस्त। शैशवावस्था से जात-जात के विकिरणों और प्रदूषणों का शिकार होकर हम अपने सारे के सारे आरोग्य को भुला बैठे हैं। लगता है कि जैसे इंसान नहीं, कोई मशीनें ही धड़ाधड़ पैदा हो रही हों।
लोग अपनी जिन्दगी को कोसते रहते हैं। कभी अभावों का रोना रोते रहते हैं और कभी पूरी दुनिया के साधनों और भोग-विलास के माध्यमों को अपनी मुट्ठी में नहीं हो पाने की विवशता का दुखड़ा। शरीर के तमाम अंगों का कबाड़ा कर डालने के लिए हमारे पास इतना अधिक है कि जिसके रहते हुए हमें मृत्यु के देवता को याद करने की कोई जरूरत नहीं है।
हर अंग का क्षरण करने और उसे निष्प्रभावी करने के लिए बहुत सारे ताम-झाम हैं, भोग-विलास के संसाधन हैं और आधुनिकतम रास्ते हैं जिनके लुभावने सफर पर जो एक बार बढ़ चलता है वह हमेशा-हमेशा के लिए गर्त में चला जाता है।
दारू, गुटखा, तम्बाकू से लेकर हमारे पास वह सब कुछ है जिसका हम मनमाना उपयोग करते हैं और लगता है कि जैसे हमारी मृत्यु के सारे प्रबन्ध हम ही कर रहे हैं। हमारे लिए यमराज को कुछ नहीं करना है।
फिर बीमारियों का महा संसार और इनके साईड इफेक्ट इतने सारे हैं कि हमारे लिए विधाता को कुछ नहीं करना है। अपने आप मरते रहो, निरन्तर ऊपर पहुंचते रहो। देहपात के समय हर किसी को ध्यान आता है कि जो वह करता रहा है वह कितना आत्मघाती था। यह अक्ल पहले आनी चाहिए। शरीर को आदर सम्मान दें और सृष्टि के लिए खुद भी जियें तथा औरों को भी जीने दें।
दुनिया भर के संसाधन भले हमारे पास कितने ही हों, कितना ही वैभव पसरा हुआ क्यों न हो, यदि हम ही न रहें, तो ये सारे किस काम के।
इंसान उन वस्तुओं और तत्वों की ओर भागता है जो उसकी नहीं हैं, उन्हें बनाने की कोशिश करता रहता है लेकिन भगवान के दिए हुए शरीर की उपेक्षा करता है।
उसका यह स्वभाव केवल शरीर के प्रति ही नहीं है बल्कि उन सभी के प्रति है जो उसे बिना मेहनत के मिल जाया करते हैं चाहे वह कोई व्यक्ति हों या फिर संसाधन, जमीन-जायदाद हो या पद-प्रतिष्ठा।
कुछ ही लोग होते हैं जो अपने जीवन और उसके लक्ष्य को समझते हैं और उसका आदर करते हुए जीवन में आगे बढ़ते रहते हैं अन्यथा बहुत से लोग हैं जो सहजता से प्राप्त हर वस्तु और व्यक्ति की उपेक्षा करते हैं लेकिन इनके अलावा के प्रति आकर्षण के सहारे बढ़ते रहते हैं।
आजकल कमोबेश सर्वत्र यही स्थिति है। भगवान का दिया हुआ यह शरीर दैवीय और दिव्य तत्वों से भरपूर रहना चाहिए और इसके लिए जिन्दगी भर प्रयत्न भी करते रहना चाहिए।
लेकिन लोग शरीर की हमेशा उपेक्षा करते रहते हैं और तब तक करते रहते हैं कि जब तक शरीर काम करना बंद न कर दे। शरीर को उन्हीं तत्वों से भरपूर रखने का प्रयत्न करते रहना चाहिए जो कि उनके लिए जरूरी हैं, गुणदायी और पौष्टिक हैं।
ऎसा होने पर शरीर हमेशा अपना साथ देता है और शरीर को लम्बे समय तक चलाने की गारंटी भी देता है लेकिन हम शरीर का अनादर करते रहने के आदी होते जा रहे हैं और उसे उन वस्तुओं से भरते जा रहे हैं जिनका कोई उपयोग नहीं है।
आजकल हमारी दैनिक जीवनचर्या का हाल इतना अधिक बिगड़ा हुआ है कि कुछ कहा नहीं जा सकता। शरीर को जो कुछ जरूरी है वह उसे निरन्तर प्राप्त होते रहना चाहिए। इसके खान-पान से लेकर जीवन व्यवहार और व्यायाम, धर्म-अध्यात्म का चिन्तन और मानसिक खुराक आदि सब कुछ समाहित हैं जिन्हें शरीर के लिए आवश्यक माना गया है।
शुद्ध-सात्विक और पोषणदायी खान-पान से लेकर हर तरह की चर्या को अपनाने की आवश्यकता है। जिस शरीर को विधाता ने बनाया है वह अपने आप में परफेक्ट संरचना है जिसे यदि हम संभाल कर रखते हुए जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहें तो लम्बे समय तक जी सकते हैं और संसार का आनंद प्राप्त कर सकते हैं।
लेकिन हम लोग शरीर की उपेक्षा करते हैं। नख से लेकर शिख तक हम सभी लोग सौन्दर्य तो भरपूर चाहते हैं लेकिन सौन्दर्य के जनक अंग-उपांगों के प्रति लापरवाही बरतते हैं। तने और पत्तों को हम खूब सींचते हैं लेकिन जड़ों की ओर कोई ध्यान नहीं दे पा रहे हैं।
ये जड़ें शारीरिक सौष्ठव की हो सकती हैं, संस्कारों, सभ्यता एवं परंपराओं की हो सकती हैं और उन सभी कारकों की हो सकती हैं जिनके बूते हमारे पुरखों ने दुनिया को इतना कुछ दिया है कि हम भुला नहीं पाते। और दूसरी तरफ हम क्या दे पा रहे हैं।
भोग-विलास के उपकरणों से बीमारियों का महा भण्डार। जिससे कि नई पीढ़ी या तो मरियल हो रही है या फिर जरूरत से कहीं अधिक मोटापे से ग्रस्त। शैशवावस्था से जात-जात के विकिरणों और प्रदूषणों का शिकार होकर हम अपने सारे के सारे आरोग्य को भुला बैठे हैं। लगता है कि जैसे इंसान नहीं, कोई मशीनें ही धड़ाधड़ पैदा हो रही हों।
लोग अपनी जिन्दगी को कोसते रहते हैं। कभी अभावों का रोना रोते रहते हैं और कभी पूरी दुनिया के साधनों और भोग-विलास के माध्यमों को अपनी मुट्ठी में नहीं हो पाने की विवशता का दुखड़ा। शरीर के तमाम अंगों का कबाड़ा कर डालने के लिए हमारे पास इतना अधिक है कि जिसके रहते हुए हमें मृत्यु के देवता को याद करने की कोई जरूरत नहीं है।
हर अंग का क्षरण करने और उसे निष्प्रभावी करने के लिए बहुत सारे ताम-झाम हैं, भोग-विलास के संसाधन हैं और आधुनिकतम रास्ते हैं जिनके लुभावने सफर पर जो एक बार बढ़ चलता है वह हमेशा-हमेशा के लिए गर्त में चला जाता है।
दारू, गुटखा, तम्बाकू से लेकर हमारे पास वह सब कुछ है जिसका हम मनमाना उपयोग करते हैं और लगता है कि जैसे हमारी मृत्यु के सारे प्रबन्ध हम ही कर रहे हैं। हमारे लिए यमराज को कुछ नहीं करना है।
फिर बीमारियों का महा संसार और इनके साईड इफेक्ट इतने सारे हैं कि हमारे लिए विधाता को कुछ नहीं करना है। अपने आप मरते रहो, निरन्तर ऊपर पहुंचते रहो। देहपात के समय हर किसी को ध्यान आता है कि जो वह करता रहा है वह कितना आत्मघाती था। यह अक्ल पहले आनी चाहिए। शरीर को आदर सम्मान दें और सृष्टि के लिए खुद भी जियें तथा औरों को भी जीने दें।
