हम वाकई कितने काबिल हैं इसका उत्तर हमारी औकात से आसानी से मिल जाता है। सर्वाधिक काबिल इंसान उसे माना जाता है जो कि अपने पुरखों की सम्पत्ति, प्रतिष्ठा, सामाजिक साख, देशभक्ति और राष्ट्र के प्रति निष्ठा को अपेक्षाकृत बढ़ाए, इनमें अभिवृद्धि करे और पूर्वजों के मुकाबले अपने शौर्य, पराक्रम, हुनर, ज्ञान और अनुभवों में उत्तरोत्तर आधिक्य प्राप्त हो।
पुरखों के मुकाबले यदि हम किसी भी मामले में कमतर साबित होते हैं तो इसका अर्थ यही है कि हम कमजोर, पुरुषार्थहीन और नाकाबिल हैं। पूर्वजों की अपेक्षा जमीन-जायदाद और तरह-तरह की संपदा में अभिवृद्धि का यह अर्थ नहीं है कि यह काली कमाई, भ्रष्टाचार और अनीति से कमाए धन से अर्जित की गई हो बल्कि जो कुछ प्राप्त किया जाए वह अपने पुरुषार्थ और नीति से प्राप्त होना चाहिए तभी यह मान्य है।
जो लोग अपने बाप-दादाओं की जायदादों और जमीनों पर उछलकूद कर रहे हैं, उनके पुश्तैनी धंधों के नाम पर खुद को वैभवशाली दिखाने की कोशिशें करते हुए फूल के कुप्पा हो रहे हैं, उन सभी को यह सोचना चाहिए कि इन सबमें उनका खुद का पुरुषार्थ और अर्जन कितना है।
कई सारे रईसों की औलादें हैं जो बाप-दादाओं की कमाई पर ऐश कर रहे हैं, खूब सारे साहबजादे अपने साहबी संस्कृति में पले-बढ़े पिताओं की रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार से अर्जित सम्पदा पर मौज उड़ा रहे हैं। इन सभी के लिए कहा जा सकता है कि इनका कोई पुरुषार्थ नहीं है बल्कि पुश्तैनी कमाई को उड़ा रहे हैं।
जिन लोगों के पास पुरुषार्थ की कमाई होती है उनका पैसा अच्छे कामों में खर्च होता है और खुद के काम भी आता है। इसके विपरीत अनीति, भ्रष्टाचार और काले कारनामों, शोषण, रिश्वत आदि से कमाए गए धन का उपयोग इंसान न अपने लिए कर सकता है न परमार्थ में। ऐसे धन को नालायक लोग अपने मौज-शौक में उड़ाते हुए खत्म कर दिया करते हैं। काली कमाई करने वाले के भाग्य में केवल पाप ही पाप जुड़ता चला जाता है।
इसी तरह खूब सारे लोग हैं जो कि बाप-दादों की संपदा और साख दोनों को बचाने में नाकामयाब रहते हैं उल्टे पूर्वजों का नाम बदनाम करने में कोई कसर बाकी नहीं रखते। ऐसे वंशज किस काम के, जिनकी वजह से स्वर्गस्थ पूर्वजों की छवि जगत में मटियामेट हो।
परिश्रमी और पुरुषार्थी इंसान वही है जो कि अपने पुरखों से अधिक कुछ करे, समाज के लिए उनसे अधिक काम आए, देश के लिए काम आए और आम लोग उन्हें मन से स्वीकारें।
बहुत सारे लोग हैं जिनके पास अपार धन-सम्पदा और सभी तरह का वैभव है लेकिन इनके बारे में आम जन की धारणा अच्छी नहीं होती, बल्कि लोग इनके लिए नकारात्मक शब्दों का प्रयोग करते हैं और कई सारे तो इन्हें गालियाँ बकते नज़र आते हैं।
यह प्रश्न ख़ासकर उन युवाओं के लिए चुनौती है जो यौवन की खुमारी में अपने लक्ष्य से भटक गए हैं और व्यक्तित्व विकास केे लिए अनुकूल अवसरों के दिनों में मौज-मस्ती और धींगामस्ती में रमे हुए हैं। इन लोगों को पता नहीं है कि जो संचित है वह एक न एक दिन नष्ट हो जाने वाला है।
इसलिए पुरुषार्थ के किसी न किसी अवसर से जुड़ कर अपने भविष्य को सँवारें और व्यक्तित्व को इतनी अधिक ऊँचाई दें कि इनके पुरखों और माता-पिता तथा दादा-दादी को भी अपने वंशजों पर गर्व हो। अपने माँ-बाप को जिस दिन यह गर्व हो जाए कि उनकी संतान उनसे अधिक योग्य, समृद्ध और पुरुषार्थी है, वह दिन ही सौभाग्यशाली और गौरवदायी है।
अपने घर के बुजुर्ग, भाई-बहन, परिवारजन और माता-पिता यदि अपने से असंतुष्ट, अप्रसन्न हैं और हमें कोसते रहें, तब यह समझ जाना चाहिए कि इंसान के रूप में हमारा अवतरण बेकार है और हमारा पूरा जीवन व्यर्थ है। जननी, जनक और जन्मभूमि जिनसे संतुष्ट नहीं होते, जगदीश्वर भी उनसे कभी प्रसन्न नहीं हो सकता।
हर दिन अमूल्य है। जो दिन जा रहा है वह वापस आने वाला नहीं है। एक-एक दिन हमारी आयु कम होती जा रही है, हम रोजाना मृत्यु के एक डग करीब पहुंचते जा रहे हैं। आज का मोल नहीं पहचाना तो कल हमें भुला देगा।
समय के महत्व को जान लेने का संदेश हर दिन सूरज देता है। हर एक में इतना अधिक सामथ्र्य है कि वह दुनिया के लिए नई से नई सोच दे सकता है और सृष्टि को उपहार देकर कालजयी यश पा सकता है लेकिन उसके लिए जीवन के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग जरूरी है।
आज भी हम अपने पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान और अनुभवों से कौटुम्बिक विकास में आगे नहीं बढ़ पाए तो हमारे जीवन का कोई मोल नहीं है। हमारे पूर्वज और अग्रज तभी खुश हो पाते हैं जबकि हम उनके मुकाबले आगे बढ़कर दिखाएं।
जो यह चुनौती स्वीकार कर लेता है वही कीर्ति प्राप्त करने का अधिकारी है, बाकी बचे हम सारे तो टाईमपास हैं, कुछ साल धरा पर बोझ बन कर रहेंगे, फिर अंतिम बार मनुष्य जन्म पूरा कर बिना उपलब्धियों के ऊपर लौटना ही है।
